प्रज्ञा-ग्रन्थ : अध्याय 14
1) कोई व्यक्ति समुद्री यात्रा करना चाहता है और उसे प्रचण्ड लहरों को पार करना है, तो वह ऐसी लकड़ी से प्रार्थना करता है, जो उस जहाज से भी जर्जर है, जिस पर वह सवार है;
2) क्योंकि लाभ की लालसा ने वह जहाज बनवाया और वह एक कुषल कारीगर द्वारा निर्मित हुआ है।
3) किन्तु, पिता और विधाता! तू जहाज का संचालन करता है; क्योंकि तूने समुद्र में उसका मार्ग प्रषस्त किया और लहरों में उसके लिए एक सुरक्षित पथ बनाया है।
4) इस प्रकार तू दिखाता है कि तू हर जोखिम से बचाने में समर्थ है, उस समय भी, जब कोई अनाड़ी जहाज चलाता है।
5) तू यह नहीं चाहता कि तेरी प्रज्ञा की कृतियाँ व्यर्थ रहे। इसलिए मनुष्य लकड़ी के छोटे टुकड़े को अपने प्राण सौंपते और एक बेड़े पर लहरे पार करते हुए सुरक्षित रहते हैं।
6) प्राचीनकाल में भी, जब घमण्डी भीमकाय जाति का विनाष हो रहा था, तो पृथ्वी की आषा ने एक पोत की शरण ली और तेरे हाथ से संचालित हो कर उसने संसार के लिए एक नयी पीढ़ी का बीच छोड़ा।
7) धन्य है लकड़ी, जिसके द्वारा न्याय होता है;
8) किन्तु हाथ से बनी हुई वस्तु अभिषप्त है, मूर्ति भी और बनाने वाला भी, क्योंकि उसने उसे बनाया और मूर्ति नष्वर होते हुए भी ईष्वर कहलाती है!
9) ईष्वर को दुष्ट और उसकी दुष्टता, दोनों से समान रूप से घृणा है।
10) कृति को और कृतिकार को, दोनों को दण्ड दिया जावेगा।
11) इसलिए राष्ट्रों की देवमूर्तियों को दण्ड दिया जायेगा, क्योंकि वे ईष्वर की सृष्टि में घृणा के पात्र, मनुष्यों की आत्माओंें के लिए पाप का कारण और मूर्खों के पैरों के लिए फन्दे बन गयी है।
12) मूर्तियों की कल्पना से धर्मत्याग प्रारम्भ हुआ और उनके निर्माण ने जीवन को भ्रष्ट कर दिया;
13) क्योंकि वे न तो आदि में विद्यमान थी और न सदा बनी रहेगी।
14) मनुष्यों की व्यर्थ कल्पना के कारण उनका पृथ्वी पर आगमन हुआ था और इसलिए उनका आकस्मिक अन्त निष्चित किया गया है।
15) अप्रत्याषित शोक से दुःखी हो कर किसी पिता ने अपने बच्चे की मूर्ति बनवायी, जिसकी असमय में मृत्यु हो गयी थी। जो बच्चा मनुष्य के रूप में मर गया था, वह उसे अब देवता का आदर देने और अपने अधीन लोगों द्वारा पूजा-पाठ कराने लगा।
16) इसके बाद इस दुष्ट प्रथा को बल मिला, उसका विधिवत् पालन होने लगा और शासकों के आदेष पर गढ़ी मूर्तियों की पूजा होती रही।
17) लोग राजाओं को अपने सामने आदर नहीं दे सकते थे; क्योंकि वे उन से दूर रहा करते थे। इसलिए उन्होंने दूरवर्ती आकृति का प्रतिरूप बना कर समादृत राजा की प्रत्यक्ष मूर्ति की रचना की, जिससे वे अपने उत्साह से अनुपस्थित की चापलूसी कर सके, मानो वह विद्यमान हो।
18) जो लोग राजा को नहीं जानते थे, वे भी कलाकार के अपूर्व उत्साह से प्रेरित हो कर मूर्ति की पूजा में सम्मिलित हो जाते थे;
19) क्योंकि कलाकार ने शासक का कृपापात्र बनने के उद्देष्य से अपने कौषल से मूर्ति को वास्तविकता से सुन्दर बनाया था।
20) भीड़ ने मूर्ति के सौन्दर्य से मोहित हो कर उसे, जो पहले समादृत मनुष्य था, अपनी आराधना का विषय बनाया।
21) इस प्रकार यह प्रथा मानव जीवन के लिए फन्दा बन गयी; क्योंकि मनुष्यों ने, चाहे अपने दुर्भाग्य से या शासकों के दबाव से, पत्थर या लकड़ी के टुकड़ों को वही नाम दिया, जो किसी दूसरे को नहीं दिया जा सकता है।
22) वे न केवल ईष्वर के ज्ञान के विषय में भटक गये, बल्कि वे अपने अज्ञान के कारण जो घोर संघर्ष का जीवन बिताते हैं, अपनी उस दयनीय दषा को शान्ति का नाम देते हैं।
23) वे अपने पुत्रों की बलि चढ़ाते, रहस्यानुष्ठान मनाते और रंगरलियों के साथ दावतें उड़ाते हैं।
24) वे न तो जीवन का आदर करते और न विवाह की पवित्रता का। वे षड्यन्त्र रच कर एक दूसरे का वध करते और व्यभिचार द्वारा एक दूसरे को दुःख देते हैं।
25) चारों ओर अव्यवस्था है : रक्त और वध, चोरी और छलकपट, प्रलोभन और बेईमानी, दंगा और झूठी शपथ,
26) मूल्यों का विघटन, परोपकार की कृतनता, आत्माओं का दूषण, अप्राकृतिक संसर्ग, विवाह का व्यतिक्रम और लम्पटता;
27) क्योंकि घृणित देवमूर्तियों की पूजा सभी बुराईयों का प्रारम्भ, कारण और पराकाष्ठा है।
28) मूर्तिपूजक या तो आनन्दातिरेक में पागल हो जाते, या झूठी भविष्यवाणी करते, या अन्याय की कमाई खाते हैं, या झूठी शपथ खाने में संकोच नहीं करते।
29) वे निर्जीव देवमूर्तियों पर भरोसा रखते हैं, इसलिए उन्हें अपनी झूठी शपथों के कारण किसी अनर्थ की आषंका नहीं है।
30) किन्तु उन्हें दोहरा दण्ड दिया जायेगा; क्योंकि उन्होंने देवमूर्तियों के अनुयायी बनने के कारण ईष्वर के विषय में भ्रान्तिपूर्ण विचार रखा और पवित्रता की उपेक्षा करते हुए कपट से झूठी शपथ खायी।
31) शपथ के समय जिनका नाम लिया जाता, उनकी शक्ति नहीं, बल्कि न्याय ही पापियों को सदा उनके अपराध का दण्ड देता है।